मुकरा




'लूंगा-लूंगा-लूंगा, कम से कम पांच सौ के ही लूंगा।' मुकरा ने तो जैसे जिद ही पकड़ ली थी। सुबह से ही वह पांच सौ रुपए की मांग कर रहा था। रामरती परेशान थी। पांच सौ रुपए मुकरा पटाखों में फूंके, वह इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थी।

खींचतान के मुश्किल से साढ़े चार-पांच हजार रुपए ही तो घर में आ पाते हैं। उसका पति उमेसा और वे दिनभर जी-तोड़ परिश्रम करते हैं, तब कहीं गुजारे के लायक कमा पाते हैं और यह मुकरा... ऊंह कुछ समझता ही नहीं।
 
रामरती बड़बड़ा रही थी। इत‌नी-सी कमाई में मुकरा की पढ़ाई, दूध पीती छोटी-सी बुधिया का खर्च और फिर खाने-पीने, राशन-पानी का खर्च। कैसे जिंदगी की गाड़ी चल रही थी, यह वही जानती थी। सुबह से शाम तक पांच-सात घरों में खटती रहती, झाड़ू-पोंछा करती, बर्तन मांझती तब कहीं जाकर पहली तारीख को ढाई-तीन हजार रुपए ही ला पाती।
 
उमेसा का क्या है, कभी डेढ़ हजार तो कभी दो हजार, इतना ही तो लाता है। ठेकेदार के पास मजदूरी करता है। ईंट-गारे का काम है, रोज तो होता नहीं, मिल गया तो ठीक नहीं तो जय सियाराम। कहीं भी बैठकर उमेसा बीड़ी धोंकने लगता है। उसका खुद भी तो कोई ठिकाना नहीं होता। कभी कोई घर छूट जाता तो दूसरा देखना पड़ता। खैर, गाड़ी तो चल ही रही थी।
 
आज वह दो घरों से कुछ रुपए दिवाली खर्च के लिए एडवांस ले आई थी। कुछ लोग होते हैं, जो दूसरों का दुख-दर्द समझते हैं और यदा-कदा सहायता कर देते हैं। मिसेस चड्ढा और मिसेस गवली ने महीने की पगार, महीना समाप्त होने के पांच दिन पहले ही दे दी थी। दिवाली तेईस तारीख को पड़‌ गई थी। आठ सौ रुपए में पूजा का सामान, प्रसाद, मिठाई, फल-फूल लाएं या कि मुकरा को फूंकने को दे दें।
 
मुकरा का असली नाम मुकुंदीलाल था, किंतु मुख सुख की चाहत ने उसे मुकरा बना दिया था। अभावों में रहते हुए भी रामरती ने बच्चों की परवरिश में कोई भी कमी नहीं आने दी थी। मुकरा सातवीं में हिन्दी माध्यम के स्कूल में पढ़ रहा था। सरकार से किताबों और साइकल की व्यवस्था हो जाने से वह बेफिक्र थी।
 
मिड डे मील में उसे शाला में ही खाना मिल जाता था। चूंकि मुकरा पढ़ने में भी होशियार था अत: उसे सौ रुपए महीने की छात्रवृत्ति भी मिल रही थी। आज दिवाली होने के कारण उसकी और उमेसा दोनों की छुट्टी थी। वह तो खैर घर मालकिनों को बताकर आई थी कि वह दिवाली के दिन काम पर नहीं आएगी।
 
मालकिनें नागा करने के कभी भी पैसे नहीं काटती थीं किंतु उमेसा... काम नहीं तो पैसा भी नहीं। बाजार जाने का प्रोग्राम बन गया था। दिवाली का सामान तो लाना ही था। दीये, तेल, बत्तियां, केले, मिठाई, लक्ष्मीजी की फोटो और नारियल, फल-फूलों में ही पांच-छह सौ रुपए लग जाएंगे। पूजा का सामान तो आ ही जाएगा, परंतु इस मुकरा का क्या करें, जो सुबह से अड़ा है कि पांच सौ ही लूंगा।
 
'बेटा पांच सौ तो बहुत होते हैं अपनी हैसियत नहीं है इतनी। फिर पटाखे चलाने का मतलब रुपए फूंकना ही है', रामरती उसे समझा रही थी।

'अम्मा पांच सौ से बिलकुल कम न‌हीं लूंगा। इतनी महंगाई में पांच सौ में आता क्या है? दस अनार और दस रस्सी बम ही तीन सौ रुपए में आएंगे। फिर चकरी, फुल‌झड़ी दीवाल फोड़... पांच सौ भी कम पड़ जाएंगे।'
 
'परंतु बेटे...'
 
'मैं कुछ नहीं सुनूंगा। सुन्नी एक हजार के लाया है। टंटू अपने बापू के साथ बाजार जा रहा है, कह रहा था अपने बापू से दो हजार के खरीदवाऊंगा।'
 
'पर बेटा वे लोग पैसे वाले हैं, सुन्नी का बाप तहसील ऑफिस में बाबू है। टंटू के बाप की दारू की दुकान है। ये लोग तो कितने भी रुपए खर्च क‌र सकते हैं, फूंक सकते हैं पर...'
 
'नहीं-नहीं बिलकुल भी नहीं, मुझे अभी पांच सौ रुपए दे दो।'



'मैं खुद ही बाजार चला जाऊंगा और पटाखे लूंगा अपनी मर्जी के, बिलकुल सौ टंच।' मुकरा के सिर पर‌ तो पटाखों का भूत सवार था।
 
'ठीक है' रामरती ने उसके सामने एक पांच सौ का नोट फेंक दिया था और गुस्से में फनफनाती हुई भीतर किचन में चली गई थी।
 
मुकरा ने वह नोट उठाया और बाजार चल दिया विजयी मुद्रा में। जैसे मां और बेटे के बीच लड़े गए पानीपत के युद्ध में बेटा जीत गया हो। उसे अब कौन समझाए कि ऐसी पानीपत की लड़ाइयों में माताओं को हारने में कितना आनंद आता है अन्यथा माताओं को कौन हरा सकता है? मां तो मां ही होती है। उसकी ममता बेटों की जिद के आगे अक्सर हथियार डाल देती है।
 
धीरे-धीरे शाम धरती पर उतर आई। मां का गुस्सा कपूर की तरह थोड़ी देर में ही उड़ गया। आखिर बच्चा ही तो है, मन की उमंगें हिलोर लेती रहती हैं। किसी मित्र को कुछ नया करते देखता है तो उसकी भी इच्छा वैसा ही करने की हो उठती है। मां प्रतीक्षा में थी कि मुकरा आते ही कहेगा- 'देखो मां इतने सारे पटाखे! अनार, चकरी, फुलझड़ी, दीवाल फोड़... रामबाण... पांच सौ रुपए में इतने सारे।'
 
परंतु रात होने को आई और वह आया ही नहीं, तब रामरती को चिंता हुई कि कहां गया होगा? इतनी देर तो वह कहीं रुकता ही नहीं। उमेसा भी परेशान हो गया, जो अभी-अभी बाजार से पूजा का सामान लेकर आया था। उसे बाजार में भी मुकरा कहीं नजर नहीं आया था। हे भगवान! क्या हुआ लड़के को, सोचते-सोचते उमेसा उल्टे पांव लौट गया। मुकरा के दोस्तों के घर जा-जाकर पूछने लगा। उसके एक दोस्त ने बताया कि उसे राम बाबू कक्का के साथ अस्पताल जाते देखा था।
 
'क्या अस्पताल? क्या हुआ था मुकरा को?' उमेसा बौखला-सा गया।
 
'उसे कुछ नहीं हुआ। राम बाबू कक्का के सिर से जरूर खून बह रहा था।'
 
दोस्त के मुंह से यह सुनकर उमेसा की जान में जान आई। दौड़ा-दौड़ा वह अस्पताल जा पहुंचा। ढूंढता-खोजता वह उस कमरे में पहुंच ही गया, जहां राम बाबू कक्का पलंग पर पड़े थे और मुकरा बगल में एक स्टूल पर बैठा था। राम‌बाबू के सिर पर पट्टी बंधी थी और वे कराह रहे थे।
 
'क्या हुआ मुकरा? इनको क्या हुआ? तुम यहां कैसे आए?' उमेसा जैसे उस पर टूट पड़ा। इतने सारे प्रश्न एकसाथ सुनकर मुकरा से तत्काल कोई जबाब देते नहीं बना। थोड़ी देर वह चुप रहा फिर उसने बताया कि कक्का रास्ते में चक्कर खाकर गिर पड़े थे। सिर एक पत्थर में टकराने से खून बह रहा था और वह उन्हें अस्पताल ले आया था। राम बाबू कक्का फफककर रोने लगे थे और मुकरा के सिर पर हाथ फेरने लगे थे।
 
क्या हुआ राम बाबू, सब ठीक तो है, अब अच्छे हो न? उमेसा ने सहानुभुति दर्शाते हुए पूछा।
 
'बिलकुल ठीक हूं भैया, तुम्हारा बेटा तॊ साक्षात कृष्ण का अवतार है। यह न होता तो आज मैं सड़क पर ही मर जाता। मुझे यह यहां तक ले आया और भरती कराया। सब दवाइयां अपने पैसे से ले आया।' राम बाबू अभी भी कराह रहे थे।
 
'तू तो पटाखे लेने के लिए बाजार गया था, पटाखे नहीं लिए क्या?' उमेसा ने पूछा।
 
'नहीं बापू नहीं लिए कक्का की दवाई में...।'
 
'तू तो जिद कर रहा था पटाखों की, अब क्या करेगा?'
 
'नहीं बापू मुझे नहीं चाहिए पटाखे, कक्का ठीक हो गए, मुझे तो बहुत अच्छा लगा। पटाखे तो जलकर राख ही होने थे।'
 
उमेसा को लगा कि मुकरा अपनी उम्र से बहुत ज्यादा बड़ा हो गया है। उसने बेटे को गले से लगा लिया। राम बाबू कक्का के आंसुओं की धार और तेज हो गई थी।


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