वही मेरा पहला और आखिरी प्यार है


मेरा नाम समीर है। मैं एक लड़की से बहुत प्यार करता था और शायद आज भी करता हूं। यह उस समय की बात है , जब मैं दसवीं में था और वह नवमीं में पढ़ती थी। मैं दसवीं की पढ़ाई अपने जिले में करने के लिए गया था। मैं जहां रहता था , उसके पास ही जिले का कॉलिज है और मैं प्रतिदिन वहां शाम को घूमने जाया करता था। उसी के पास उसका भी घर था। मैंने उसको पहली बार 9 जून 2001 को देखा था , लेकिन मुझे उस समय उसके प्रति कोई खयाल नहीं आया। इस प्रकार हम दोनों प्रतिदिन मिल जाते थे , चूंकि वह थी भी बहुत सुंदर तो एक झलक देख ही लेता था।

धीरे - धीरे हम दोनों एक - दूसरे को देखने के आदि हो गए। एक दिन मैं उसके पास से गुजर रहा था तो उसने पूछ दिया कि आप क्या देख रहें हैं और मैं सकपका गया और सीधे अपने रास्ते चल दिया। थोड़ी दूर जाने के बाद मैंने पलट कर देखा तो वह भी मुझे ही देख रही थी और जब मैंने देखा तो वह मुस्कुराते हुए नज़रे चुराने लगी। मैं वहां से चला गया और एक मेरा दोस्त था , जो उसी के मुहल्ले में रहता था उससे मैंने उसके बारे में पूछा। उसने उसके बारे में जो भी जानता था सबकुछ बता दिया। अब वह मेरे खयालों में आने लगी और मेरी नज़रों के सामने अक्सर उसका चेहरा आ जाता था। मुझे लगने लगा कि मुझे प्यार हो गया। मैंने फैसला किया कि कल उसको सबकुछ बता दूंगा और तरकीब ढूंढने लगा। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि कल उसे एक प्यार भरा खत देना है और रात भर खत लिखने और अगले दिन के बारे में कल्पना करते रात कट गई।

सुबह हुई और मैं तैयार होकर अपने प्यार का इजहार करने के लिए चल दिया। वह दस बजे स्कूल जाती थी और मैंने यही समय चुना। वह ठीक अपने समय पर थी और मैं भी तैयार था। जब उसने मुझे खड़ा देखा तो वह अपने सहेलियों से पीछे हो गई। जैसे - जैसे वह मेरे सामने आ रही थी , मेरे दिल की धड़कने तेज हो रही थी। जब वह मेरे करीब आ गई तो मैंने कहा - सुनिये तो , उसने मुड़ कर देखा और रुक गई। उसने पूछा , क्या है , तो मैंने खत देते हुए कहा - यह आपके लिए है। तो उसने कहा , यह क्या है ? मैंने कहा खुद खोलकर देख लिजिए और मैं वहां से चला गया। यह सब बातें अब उसकी सारी सहेलियों को भी पता चल चुकी थी।

अब मैं उसके स्कूल में टिफिन का इंतजार करने लगा। टिफिन हुआ और मैं वहीं पर खड़ा हो गया। जब उनलोगों ने मुझे देखा तो उसकी सारी सहेलियां उसे मेरी ओर भेजने लगीं। वह मेरे पास आयी और मेरा खत वापस देते हुए बोली - यह मुझे नहीं चाहिए और चली गई। अब तो मुझे जैसे सांप ही सूंघ गया था और मैं वहां बहुत देर तक यूं ही खड़ा रह गया। तभी मेरे दिमाग में आया कि शायद इसी खत में कुछ लिखी हो और जब मैंने उसे खोल कर देखा तो मेरे होश उड़ गए उसका भी जबाव हां था। पहले तो मुझे कुछ देर तक विश्वास ही नहीं हो रहा था , फिर मुझे खुशी से नाचने को जी करने लगा और उसके इंतजार में दो घंटे वहीं बिता दिए।

जब छुट्टी हुई तभी उसकी सहेली का भाई आ गया और कुछ बात नहीं हो पायी। मेरी दसवीं की परीक्षा भी नजदीक आ गई थी , इसलिए मैं अपनी तैयारी में जुट गया। लगभग तीन महीने बीत गए और मैं उससे मिल नहीं पाया। जब मैं परीक्षा देकर लौटा तब मैं फिर उसके स्कूल के समय में उसका इंतजार करने लगा और वह आयी , लेकिन काफी गुस्से में थी और अजीब सा चेहरा बना रखा था। मैं उससे कुछ कहने जा रहा था तभी वह बोल पड़ी कि मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी है और वह अपनी सहेलियों के साथ चली गई। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हो गया। फिर मैंने सोचा गलती तो मेरी ही है , तो उसकी सहेली से बात करने का विचार किया। मैंने उसकी सहेली का नाम लेकर बुलाया तो वह मेरे पास आई और बोली , हां कहिए जीजाजी। तो मैंने पूछा कि वह मुझसे बात क्यों नहीं कर रही ? उसने बताया कि वह आपसे नाराज है , आप उसको बता कर गए थे परीक्षा देने और जब उसने आपके दोस्त से पूछा तो उसने कहा - समीर तो परीक्षा देने के बाद पटना चला जाएगा और आगे की पढ़ाई वहीं से करेगा।

मैं अब रात भर सोचने लगा कि कैसे मनाऊं। मेरी मनाने की सारी कोशिशें नाकाम हो रही थी । इसी दौरान मेरे बहुत सारे दोस्त भी बन गए और उसमें एक था राजीव। उसको भी मैंने अपनी बात बताई तो उसने कहा ठीक है। उसको रूठे हुए 6 महीने से भी ज्यादा हो गया , लेकिन वह मुझसे बात करने को तैयार नहीं हुई। मैं भी हिम्मत हारने वालों में से नहीं था और उसके सहेली के घर प्रतिदिन फोन करता था , लेकिन उसने कभी बात नहीं की। मैं गुस्सा होकर 2 महीने तक उसे दिखाई ही नहीं दिया और नया साल भी आने वाला था। मैं उसे 30 दिसम्बर को फोन किया और यह सोच कर किया कि आज हां या ना हो ही जाए।

फिर फोन पर उसने बात की और कहा , आप इतने दिनों से कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं ? मैंने भाव खाते हुए कहा , पढ़ाई का दबाव है तो उसने कहा कि इतना पढ़ाई मे ध्यान देने लगे कि मुझे भूल गए ! मैंने कहा , मैं आपको नहीं भूला तो उसने कहा कि इतने दिन बिना देखे कैसे रह गए ? मैंने कहा कि मैं तो आपको रोज देखता था , यह अलग बात है कि आप मुझे नहीं देख पाती थीं। फिर मैंने कहा - आई लव यू , तो उसने कहा - बट ! आई डॉन्ट लव यू। मैंने पूछा क्यों, तो उसने कहा मैं नहीं बताऊंगी और यह कहते हुए फोन उसने अपनी सहेली को दे दी। उस दिन के बाद फोन का सिलसिला चालू हो गया।

जब वैलंटाइंस - डे के दिन मैंने फिर से उसे एक फूल देकर आई लव यू कहा तो उसने फूल तो ले ली , लेकिन बोली - आई डॉन्ट लव यू और चली गई। फिर मैंने अगले दिन फोन किया तो उसने कहा आप मुझे रोज फोन करके परेशान क्यों करते हैं तो मैंने कहा - क्योंकि मैं आपसे प्यार करता हूं। उसने कहा - आप मुझसे क्या चाहते हैं तो मैंने कहा - एक बार आई लव यू बोल दिजिए तो उसने फौरन आई लव यू कह डाला। मैंने कहा एक बार और तो उसने कहा , क्यों ? मैंने कहा कि यकीन नहीं हो रहा है और उसने 4 से 5 बार आई लव यू कह दिया। अब यकीन हुआ तो मैंने कहा एक बार और तो उसने कहा आई डॉन्ट लव यू तो मैंने कहा यह क्या है ? वह बोली कि यह बोनस है। फिर इधर - उधर की बातें करने लगी। फिर हमारा प्यार लगभग 2007 तक चला और शायद आज भी है।

अब उसकी शादी भी हो गई है और मैं अब दिल्ली में एमसीए कर रहा हूं तथा एक आईटी कम्पनी मे एसइ हूं । मैं आज भी वह सारे पल याद करके एक अलग सी ताजगी महसूस करता हूं। मुझसे उससे न कोई शिकवा और न कोई गिला है। उसने मुझे जो दिया है शायद मैं उसे कभी भुला नहीं पाऊंगा । मैं उसे आज भी उतना ही प्यार करता हूं और शायद आगे भी करता रहूंगा। वही मेरा पहला और आखिरी प्यार है। शायद ऐसा प्यार मैं अपनी लाइफ में दोबारा नहीं कर पाऊंगा। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि आप जहां भी रहें हमेशा खुश रहें , क्योंकि अगर आप खुश हैं तो यकीन मानिए दुनिया में कोई एक और है जो खुश है।


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