क्यों न अब एक प्रेम पत्र लिखूं


चांस की बात है अबकी बार वैलंटाइंस डे और भारतीय प्रेम दिवस वसंत पंचमी एक दिन ही पड़ा। कहीं पर पढ़ा था कि रिसर्च ने प्रूव किया है कि 30 के बाद कपल्स में ज्यादा प्यार बढ़ता है बजाए विवाह के शुरुआत में। मौका अच्छा था- आज ही लव गुरु मैया के प्रकट होने के बारे में भी पढ़ा। बच्चे भी पीछे पड़े रहते थे। पर समय की कमी और झिझक के कारण कभी भी अपने इमोशंस का इजहार नहीं किया। बच्चों को पालने-पोसने में ही सारा समय निकल गया। हमारे बच्चे आज सेटल हो गए हैं। दादी बनने की उम्र में दादागीरी करूं। सोचा क्यों न तुम्हें एक प्रेम पत्र लिखूं।

मुझे जब तब हंसी आती रही है जब मैं बचपन में अपनी दादी को दादा के ऊपर खीजते देखती। अब तो सुधर जाओ इतनी दौड़ भाग मत करो। बच्चों की तरह खिलन्दड़ापन दिखाते हो। दादाजी मूंछों पर ताव देते और हंसते हुए कहते 'साठा सो पाठा'। अपनी चाचियों को मुंह में पल्ला दबा कर हंसते हुए देखती तो मेरी किशोरवय की समझ हकबका जाती। आज उस संदर्भ में सोचती हूं तो अपने ऊपर ही हंसी आती है। मुझे अच्छी तरह याद है विवाह पूर्व के कुछ महीने जब मेरी सखियां रिश्ते की भाभियां, तरह-तरह से समझातीं गृहस्थी का पाठ पढ़ातीं। पति को वश में रखने के नुस्खे समझातीं। नारी आंदोलनों की प्रबल पक्षधर 'मैं' बहुत सारे डिबेट एवं भाषण प्रतियोगिता की विजेता 'मैं', कानपुर के नामी-गिरामी क्राइस्ट चर्च कॉलेज की छात्रा 'मैं' बहुत सारे सहपाठी जिसे तवज्जो देते, सराहते, उस सराहना के गर्व से अभिभूत 'मैं' ये ठाकर मन में दिल्ली पहुंची कि ससुराल में घुसते ही अपने पति में ये 'परिवर्तन' कर दूंगी, वो 'बदल दूंगी'। उन्हें ऐसा बना दूंगी, उन्हें वैसा सोचने पर मजबूर कर दूंगी। चुटकी बजाती ही 'साहब' को 'बहादुर' में बदल दूंगी। पर आज 350 महीने बाद मैं इस सच को स्वीकार करते हुए कतई शर्मिंदा नहीं हूं कि मैंने तुम्हें बदलने- येन-केन-प्रकारेण थोड़ा बहुत ही सही बदलने की जी जान से कोशिश की और ज्यादातर असफल ही रही। कॉलेज के सहपाठियों की चाल-ढाल, मुस्कुराहट, शायराना मिजाज राजेश खन्ना हेयर स्टाइल मिला कर जो अपना ड्रीम मैन बनाया था, उसे तुममें ढूंढते-ढूंढते मैं खुद ही कहीं खो गई।

10500 दिनों की विस्तृत स्मृतियां मानस पटल पर उभर रही हैं। काफी यादें दमक रही हैं, ठुमक रही हैं मन के आंगन में। वैवाहिक जीवन के शुरुआती जीवन में मैं मायके में बड़ी और सबसे लाडली तुम संयुक्त परिवार में छोटे और कुछ व्यापारिक नाकामी तथा प्रेम प्रसंगों के चलते कुछ हद तक तिरस्कृत। जरा सी बात पर तुम्हारा हठीला हठ और रूठना-ढुमकना चिल्लाना लेकिन बड़ी से बड़ी गलती को हंस कर टाल देना, भूला देना। तुम्हारे भोले शैशव का प्रतीक ही लगा मुझे। तुम आज भी ऐसे ही हो।

मैं हमेशा तुम्हें देखकर सपने संजोती काश मेरे पंख निकल आएं तो पत्नी की तिकड़मी उड़ान भर कर तुम्हारे पेट में उतरकर ये देखना की सदैव ही चाहत रही है कि तुम्हारे पेट में कितनी रास्ते हैं जो दिल से जुड़ते हैं। कौन से रास्ते के ट्रेफिक में फंसकर मेरा बनाया खाना और उसका स्वाद तुम्हारे दिल तक नहीं पहुंचता।

किस पगडंडी की लाल बत्ती मेरे लिए निषेध का बोर्ड लगा देती है। कौन सा शॉर्टकट रास्ता मेरे प्रेमामंत्रण पर हरा हो जाएगा। कभी तुम्हें छत्तीस व्यंजन और छप्पन भोग नहीं सुहाते। कभी एक गिलास छाछ को भी रूचि लेकर पीते हो। जब तब मेरी सखियां, देवरानी, जेठानी, भाभियां उकसातीं। हम गर्मी में नैनीताल गए। पिछली बार विदेश जाने की सोच रहे थे पर पासपोर्ट नहीं बना। तुम्हारी फैमिली पिछले साल भी कहीं नहीं गई। इस बार कहां जा रहे हो? नन्दों के फोन आते भाभी आप लोगों का क्या प्रोग्राम है। फिर हम छुट्टियों का प्रोग्राम बनाए टिकट वगैरहा उसी हिसाब से देखेंगे। मैं सच्चे-झूठे बहाने बना कर चिढ़ती रहती। पर हमारा कभी भी बाहर जाना नहीं हुआ। पिक्चर, सर्कस, मेले-ठेले भी सुखद स्वप्न की तरह ही घटित होते थे। फिर मैंने परिवाल के सभी बच्चों को एकत्र करके जाना शुरू कर दिया तो तुम्हारी व्यापारिक सोच खुश हो गई और चमत्कृत भी कि चलो दुकान के नुकसान से अच्छा है। मैं ही खर्च करके बच्चों को घुमा लाऊं। मेरे इस कदम से परिवार के बच्चे खूब हिल मिल गएष खैर पर मेरी बीमारी और जल्दी-जल्दी हुए तीन ऑपरेशनों के समय लगातार तुम्हारी उपस्थिति और ठीक होकर घर आने पर दवा-खाना, नहाना-धोना करते समय तुम्हारी एकाग्रता उपस्थिति और कर्तव्यनिष्ठा ने सदैव ही उस कुढ़न पर मरहम का काम किया। पार्ट टाइम रिलेशनशिप में जीने वाली आज की पीढ़ी इस बिना दिखावे के प्रेम का महत्व शायद ही समझे। पर मैं जानती हूं कि जब मेरी बीमारी में खाने-पीने वाला व्यक्ति नवरात्रि के नौ दिन खाली दूध का गिलास पीकर गुजारे तो उसका क्या हाल होता है?

मैं सोचती थी कि तुम मेरे और घर के प्रति लापरवाह हो। जो मित्र, रिश्तेदार हमारे प्रति ईष्या-द्वेष रखें मेरा मन होता उनसे वास्ता न रखा जाए। तुम इस बात को धुएं की में उड़ा देते या गिलास में घोलकर पी जाते। आज हमारा एक बड़ा सर्कल है- ईष्टमित्र, हितैषी और परिवार के लोग साथ हैं। जब चारों और परिवर्तन की हवा चल रही है। हमारे बच्चे हमारे आज्ञाकारी हैं। वे तुम्हें मेट्रो तक लाने ले जाने के लिए सदैव तत्पर रहते। नौकरों के होते हुए भी डाइनिंग टेबल पर प्लेट लगाने और रोटी परोसने की चिंता रहती है तो मुझे लगता है कि यह परिणाम तुम्हारे न बदलने का ही है। यदि मेरे जिद पर तुम बदल गए होते तो शायद हमारे बच्चे हमसे वैसा ही व्यवहार करते। वे हमारा मान नहीं रखते, हमारे माता-पिता हम पर गौरान्वित न होते। हम अपने पुरखों पर गर्व करें ये सामान्य बात है। असल मुद्दा ये है कि हमारी कर्तव्यपरायणता से हमारे गौरान्वित हों। मेरी प्यारी नंदने और उनका परिवा (जीजाजी को सदैव नवरत्न कहते थे और वे हैं) हमारी दुख तकलीफ बांटने के लिए सदैव तत्पर न रहते। तुम्हारा बालहठ तथा तुरंत ही मान जाने की अभूतपूर्व आदत ही तो है जिसने सबको प्रेम के बंधन में जकड़ रखा है। अपनी चिंता छोड़कर दूसरों की चिंता करना, अपनी नींद ही नहीं बेडरूम भी छोड़ देना। परिवार में किसी को हारी-बीमारी हो तो सारे प्रोग्राम पोस्टपोन कर देना। टिकट कैंसल कर देना। परिवार के बीच प्यार बढ़े, उनकी कोई आवश्यकता अधूरी न रहे, ऐसा ही कुछ करना और करते जाना तुम्हारी फितरत थी तो अनचाही बातों पर क्षण भर के लिए बिफर जाना तुम्हारी आदत आज सभी बातों का लेखा-जोखा लेकर बैठती हूं तो लगता है अच्छा हुआ जो तुम न बदले। आगे भी न बदलना प्रिय। क्योंकि प्रेम बदलाव नहीं जैसा जो वैसा ही चाहना प्रेम है। प्रेम एक ऊर्जा है। एक अनुभूति है। पल-पल ध्यान रखना केयरिंग यही तो प्यार है। भरोसा सबसे असरदार केमिकल होता है। नन्हा बच्चा भी उछाले जाने पर खिलखिलाता है क्योंकि उसे भरोसा होता है कि उछालने वाला उसे मजबूती से थाम ही लेगा।

प्रेम के हजार रंग हैं। हवाओं में तिरते हजारों राग हैं। एक अनहद नाद कानों में गूंज उठा है और मैं हम में बदल चुकी हूं। हमारे बच्चे अपना सेकेंड वैलंटाइंस डे मना रहे हैं। आओ हम उन्हें प्यार का मतलब समझाएं। उनके विवाह की दूसरी वर्षगांठ पर हम विचारों से इतने उदार बनें कि दूसरों का दृष्टिकोण समझ सकें। हम अपनी भावनाओं को इतना मुक्त बना पाएं कि दूसरों के प्रति उन्हें बहा सकें। हम अपने मन को इतना संवेदनशील कर लें कि दूसरों की चोट देख सकें। हम अपने हृदय के द्वार इतने खोल सकें कि सभी का प्रेम स्वीकार कर सकें।

पार्ट टाइम रिलेशनशिप में प्यार ढूंढने वाली पीढ़ी में हमारे बच्चे भी आते हैं। वे भी वैलंटाइंन के खुमार में डूबे हैं। उन्हें आज ये समझाना बहुत जरूरू है कि संवेदना सम्मान और कर्तव्यबोध के रास्ते पर चलकर ही धैर्य की धरती पर, सम्मान भरे पर्यावरण एवं केयरिंग से ही प्रेमांकुर का जन्म होता है। यही प्रेम का वृक्ष हमें छांव एवं समाज में सम्मान दिलाता है।

वर्चुअल प्रेम कितना वर्चुअल क्यों न हो प्रेम शब्द से सम्मोहन एक मानसिक अवस्था है। अति होने पर मनोविकार बन जाता है। दिल टूटने पर पीड़ा वर्चुअल नहीं होती। अगर इंटरनेट प्रेम मिलता है तो डिस्काउंट में पीड़ा साथ मिलती है। ऐसे में ये जरूरी है कि हम अपने बच्चों को कॉमनसेंस का यूज़ करने की सलाह दें जो आजकल अनकॉमन है। बच्चों को ये समझने का मौका दें कि पुनः विवेचना, आत्ममंथन एवं चेतना के स्तर पर जागरूक होने का विषय भी है और समय भी कि संस्कारों को, सामाजिक मान्यताओं एवं परंपराओं को सिसे से नकार कर वे क्या खो रहे हैं और खोने के बदले क्या पा रहे हैं।

खैर अपने पचपनवें जन्मदिन एवं अपनी आने वाली 30वीं शादी की सालगिरह पर पहली बार उपहार मांग रही हूं कि अपने प्रेमाशीर्वाद से मेरे एवं जीवन में मृदुल ज्योत्सना बिखरते रहना क्योंकि

जेठ तुम्हीं, मधुमास तुम्ही हो
तपते जग की छाया में आस तुम्ही हो
बिरही सावन के वाक हो
दुखद हृदय की प्यार तुम्ही हो


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