मंत्र क्या हैं?


पूछने पर मिसिर माझी-गांव के सिद्ध गुरु बलिकरन ने बताया–`मंत्र देवी–वाक्य है जिसमें बेधने की शक्ति होती है. मंत्र देवी के प्रसन्न होने पर, उनकी कृपा से प्राप्त होता है. गुरु ने मंत्र के विषय में कुछ और अधिक बताने के लिए एक पाव शराब की मांग की. शराब पीकर भगवती के धाम पर बैठकर उसने बताया कार्तिक से वैशाख तक शाम को मंत्र पढ़ता हूँ. चेले मंत्र को इसी धाम के इर्दगिर्द बैठकर सिद्ध करते हैं.

मंत्र सिद्ध करने को `हबुआना’ कहते हैं. हबुआना अर्थात् मंत्र को इस तेजी के साथ पढ़ना कि मन्त्र के शब्द स्पष्ट मालूम न पड़े. धाम पर रखे बाने को अपने शरीर में बेधकर शिष्य मन्त्र के सिद्ध हो जाने का प्रमाण देता है.

शरीर में बाना बेधने से अगर पीड़ी अनुभव हो और रक्त निकल आये तो सिद्धि असफल है. अपने ही शरीर में नहीं, दूसरे के शरीर में भी बेधकर अपने मन्त्र के पूर्ण सिद्ध हो जाने का प्रमाण देना पड़ता है. अगर मन्त्र सिद्ध है तो दूसरे के शरीर में भी बाना बेधने से पीड़ा नहीं होती, रक्त नहीं निकलता मन्त्र इस प्रकार है:–

    `शिवरतन गुरु, उदराज गुरू, मनहार गुरु, गुलाल गुरु, कौनर गुरुवाइना, माले
    पाठ बहिया आयो, गुन गंवारी, बात हमारी, हम हई मोहनी भारी, बारह मनकश् शंकर
    देयी घुमायी. बड़बड़ भूतन मार गिरायी. छोटे-मोटे करीं अहारा. जै दिन
    निर्मल भूत न मिले, तै दिन करीं उपवास, काली कंडरे छोड़े बान,
    कुल-कुल-कुल-कुल कालीचरै, बावन विघाकेइ भलाई, तवन काली आय गढ़, गुरु
    दोहाई महादेव दोहाई, छत्तीसों कोटी देवता कश्दोहाई.’
    उपर्युक्त मन्त्र सिद्ध हो जाने पर जिस मन्त्र को पढ़कर ओझा बैगा, सोखा
    दुरात्मा और उसके टोने का नाश किया करते हैं, वह मन्त्र नीचे दिया जा रहा
    है. इस मन्त्र से कुछ आत्माओं के नाम और टोने के किस्म की जानकारी होती
    है–`रैमल गुरु, गुसैमल गुरू, सदई गुरु, सहास गुरु, अंधी गुरु, गाजना
    गुरू, जाधन गुरू, जगदम्बा गुरू, जाता गुरू, खंजनी गुरु, मंजनी गुरु,
    दोहाई गुरू नरसिंह की. अरघाबांधी, परदा बांधी, तीन खूट के भूत के
    बान्हें, गुरू बान्हें गुरु भाई बान्हें, गुरुक चेला बान्हें, धरती डोले,
    पृथ्वी डोले, गुरुका बान्हा ना छूटे, दोहाई गुरु नरसिंह क. बान्हीं आदि
    तमसान बान्हीं, काल गुरैया इसको टोना, विसको टोना, राकस बान्हीं, मोकस
    बान्हीं, चुसूल बान्हीं, डाइन बान्हीं, भुल्चू बान्हीं ले बान्हीं कमरू
    कमच्छा दोहाई गुरु नरसिंह क.’

बाना बांधे गुरदम भांजे दोहाई गुरू नरसिंह कश् देवी के अस्त्र को बाना कहते हैं. हर चौरे पर लोहे का एक त्रिशुल (बाना) गड़ा रहता है. त्रिशुल के अतिरिक्त बाना डीह के आकार का बारीक कोड़े का भी बना होता है. उसको मोर के पंख के कूचें में सुरक्षित रखा जाता है. इसी बाने को अपने ठुड्डी जिह्वा, भुजा में बेधकर औझा बैगा अपने चमत्कार का प्रदर्शन करते हैं. बाने का भी एक मन्त्र है. यह मन्त्र है. यह मन्त्र एक सम्वाद के रूप में पढ़ा जाता है


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