बंध और मुक्ति


बंध और मुक्ति जैसी धर्म व कर्म की व्याख्या जितनी पूर्वजन्म से सम्बंधित है उससे कहीं अधिक वर्तमान जीवन से सम्बंधित है | वर्तमान जीवन में कोई भी व्यक्ति बंधन पसंद नहीं करता | सभी को मुक्ति प्रिय है |

राग – द्वेश या आसक्ति से सम्बन्ध ही बंधन है तथा इनसे आजादी का नाम ही मुक्ति है |

हम अपने चारों और अनेक वस्तुओं से घिरे हुए हैं | जब हम उन वस्तुओं में से किसी वस्तु को पसंद करते हैं या उससे नफरत करते हैं तब उसी पसंद और नफरत से उस वस्तु के साथ राग और द्वेश प्रारंभ हो जाता है | इसी का नाम बंधन है | जब हमें अपनी पसंद की वस्तु मिल जाती है तो कुछ समय के लिए खुशी होती है | इसके विपरीत जब वह वस्तु नहीं मिलती या मिली हुई वस्तु गायब हो जावे तो दुःख होता है| जो वस्तु सुख दे रही थी वही दुःख का कारण बन गयी | जिस प्रकार चाही हुई वस्तु क्र प्राप्त होने पर सुख मिलता है उसी प्रकार अनचाही वस्तु के मिलने से दुःख होता है| यह सुख-दुःख ही आसक्ति या बंधन है |

इस सुख-दुःख की प्रतिक्रया में ही हम अपना जीवन बिता देते हैं | कभी हमें अपना जीवन जीने का समय ही नहीं मिलता | या तो हम चाहत की खोज में रहते हैं या फिर अनचाहे को हटाने में लगे रहते हैं | परन्तु जो उपलब्ध है उसके उपयोग का आनंद नहीं उठा पाते | लखपति करोड़पति बनने की चाहत में दुखी होता रहता है | वह यह नहीं सोचता कि जो लाख रूपये हैं उसका उपयोग कैसे करूँ ? और यदि करोड़ भी कर लिए तो अरब करने की सोचेगा न कि वर्तमान को सुखी बनाएगा |

यदि हम आसक्ति छोड़ द्रष्टा भाव से देखने की कोशिश करे तब ही सुख का अनुभव होगा | यह सुख ऐसा होगा जिसमे वर्तमान की वस्तु गायब भी हो गयी हो तो दुःख नहीं होगा | सुख-दुःख मन की स्थिति है | मन की आसक्ति बंधन है और बंधन है तो दुःख है| अनासक्ति में ना सुख होगा और ना दुःख, केवल समभाव होगा | समभाव में रहना ही बंधन का अभाव अर्थात मुक्ति है | मुक्त जीवन में ही स्थाई आनंद है | वर्तमान जीवन मुक्त होकर जीवें | क्योंकि यदि यह जन्म ही नहीं सुधरेगा तो आगे का कैसे सुधरेगा | बीज ही ख़राब हो तो वृक्ष या फल अच्छा कैसे होगा?

इसलिए सबसे पहले हम आसक्ति कम कर वर्तमान को सुधारें और बंधन मुक्त होकर जीवें | परलोक अपनेआप सुधर जावेगा | हम सबको समझना आवश्यक है कि आसक्ति बंधन है और अनासक्ति [समभाव] मुक्ति है |

परमात्म प्रकाश में कहा है -

भुंजतु वि निय-कम्म-फलु मोहइं जो जि करेइ|

भोय असुन्दरु सुंदरु वि सो पर कम्मु जणेइ अर्थात

जो जीव अपने कर्मों के फल को भोगता हुआ आसक्ति से अच्छा -बुरा विचारता रहता है वह नये- नये बंधन में पड़ता रहता है |

भुन्जंतु वि निय-कम्म -फलु जो तहिं राउ ण जाइ |

सो णवि बंधइ कम्मु पुणु संचिउ जेण विलाइ|| अर्थात

जो जीव अपने कर्मों के फल को भोगता हुआ उसमें लीन नहीं होता वह फिर से बंधन में नहिं बंधता और पूर्व के बंधन भी नष्ट करता है | धीरे – धीरे वह मुक्ति की और अग्रसर होता है |


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