परमात्मा का स्वरूप


हरि, हर आदि बड़े – बड़े पुरुष व स्रष्टि के सभी प्राणी जिनकी वंदना करते हैं, वह ही परमात्मा है|

जिसके सफेद काला आदि वर्ण, दुर्गन्ध, सुगन्ध आदि गंध, कड़वा,मीठा, खट्टा, आदि रस, ठंडा, गर्म, रूखा, कठोर, कोमल, आदि स्पर्श तथा जन्म व मरण नहीं है वही चिदानंदस्वभाव परमात्मा है|

जिसके क्रोध नहीं, मोह तथा कुल जाति आदि का अभिमान नहीं वही निरंजन परमात्मा है | जिसके पुण्य-पाप , राग-द्वेष नहीं, भूख-प्याष आदि एक भी दोष नहीं, वही परमात्मा है |

जिस शुद्ध आत्म स्वभाव में इन्द्रिय से उत्पन्न सुख-दुःख- नहीं, सोचने-विचारने का कोई व्यापार नहीं, वही शुद्धआत्मा अर्थात परमात्मा है |

जो निर्मल ध्यान का विषय है, जिसको देखने से पूर्व में किये समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, वही परमात्मा है|

जन्म- मरण, लाभ-हानि, सुख-दुःख, शत्रु-मित्र में समान भाव रखनेवाले पुरुषों के मन में जो कुछ प्रकट होता है, वही परमात्मा है |

जिसके ना बंध है ना संसार है तथा जो आत्मा सिद्धालय में रहती है वही परमात्मा है |

जो केवल दर्शन और केवल ज्ञानमयी है, जिसका केवल सुख स्वभाव है और अनंत वीर्यवाला है वह ही परमात्मा है |

जैसी निर्मल ज्ञानमय आत्मा सिद्धालय में रहती है वैसी ही निर्मल ज्ञानमय आत्मा देह में रहती है | इन दोनों में कोई भेद नहीं है |

जैसे अनंत आकाश में एक नक्षत्र ही समस्त संसार को प्रकाशित करता है उसी प्रकार परमात्मा के केवलज्ञान में तीनोँ लोक दर्पण के समान प्रकाशित हैं|


और पढ़ें




















2017 मिर्ची फैक्ट्स.कॉम