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जीना कैसे ?

कहीं रहने का यह नियम है कि उपयोगी, उद्योगी और सहयोगी बन कर रहना। जो उपयोगी, उद्योगी और सहयोगी होकर रहता है उसे सभी चाहते हैं और अनुपयोगी, अनुद्योगी और असहयोगी को सभी धिक्कारते हैं।
मुझे एक संत ने कहाः "जहाँ कहीं भी रहना, वहाँ आवश्यक बनकर रहना। वहाँ ऐसा काम करो, इतना काम करो कि वे समझें कि तुम्हारे बिना उनका काम रूक जायेगा। वे तुम्हें अपने लिए आवश्यक समझें। कहीं भी बोझ बनकर मत रहो।" इस हेतु....
पहली बातः शरीर को ठीक रखना चाहिए। शरीर में गड़बड़ी होगी तो कोई साथ नहीं देगा – न पुत्र, न पिता, न पत्नी।
दूसरी बातः निकम्मे रहने का स्वभाव नहीं डालना चाहिए। पहले कुछ लोग इसे पसंद कर सकते हैं किंतु वे साथ नहीं देंगे। इसलिए सदा कर्मठ रहना चाहिए।
तीसरी बातः अपने भोग एवं आराम पर अधिक खर्च नहीं करना चाहिए। मात्र जीवन-निर्वाह के लिए खर्च करना चाहिए, स्वाद पर, मजे पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। स्वाद के लिए शरीर को ही आगे करके सबको पीछे नहीं करना चाहिए। जब भगवान से प्रेम करना है तो किसी सांसारिक वस्तु के लिए दुःखी होना ही नहीं चाहिए। हृदय में भक्ति की, प्रेम की पूँजी इकट्ठी करो।

 


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