एकादशीः फलाहार

'स्कन्द पुराण' के अनुसार दोनों पक्षों की एकादशी के दिन मनुष्य को ब्राह्ममुहूर्त में उठकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और पूजा करनी चाहिए। उपवास रखकर रात्रि को भगवान के समीप कथा-कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करना चाहिए। (रात्रि 12 या 1 बजे तक जागरण योग्य है।)
जो लोग उपवास, एकभुक्त (दिन में एक समय फलाहार) अथवा शाम को तारे का दर्शन करने तक व्रत का पालन करते हैं वे धन, धर्म और मोक्ष प्राप्त करते हैं।
अनिवार्य संयोग में इस दिन उपवास न कर सके तो भी चावल तो नहीं खाना चाहिए।
एकादशी के दिन बाल नहीं कटवाने चाहिए।
एकादशी व्रत खोलने की विधिः द्वादशी को सेवापूजा की जगह पर बैठकर भुने हुए सात चनों के चौदह टुकड़े करके अपने सिर के पीछे फेंकने चाहिए। 'मेरे सात जन्मों के शारीरिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हुए' – यह भावना करके सात अंजलि जल पीना और चने के सात दाने खाकर व्रत खोलना चाहिए।
देवउठी एकादशी को भगवान श्रीविष्णु की कपूर से आरती करने पर कभी अकाल मृत्यु नहीं होती। (स्कन्द पुराण)


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