बुध तथा शुक्र सप्तम भाव के कारक हैं




बुध तथा शुक्र सप्तम भाव के कारक हैं। अत: बुध अश्लेषा, ज्येष्ठा या रेवती नक्षत्र में रहते हुए अकेला सप्तम भाव में हो अथवा शुक्र-भरणी, पूर्वा फाल्गुनी या पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में रहते हुए अकेला सप्तम भाव में हो तथा इन पर किसी अन्य ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो त्रिखल दोष के कारण सुखी दाम्पत्य जीवन में बाधक बनेंगे।

कलत्र कारक शुक्र वैवाहिक तथा यौन संबंधों का नैसर्गिक कारक है। अत: शुक्र बली, स्वराशि, उच्चगत हो अथवा शुभ भावों (केंद्र-त्रिकोण) में स्थित हो तथा दूषित प्रभाव से मुक्त हो तो अन्य दूषित ग्रहों का प्रभाव होते हुए भी दाम्पत्य जीवन को सुखद बनाता है।

इसके विपरीत शुक्र के अशुभ प्रभाव में, नीचगत, अथवा त्रिक भाव में होने पर दाम्पत्य जीवन के लिए कष्टकारक हो सकता है। इसी प्रकार शुक्र-मंगल की युति अति कामुक और उत्साही बनाती है। सूर्य तथा शनि के साथ मिलकर शुक्र जातक की यौन शक्ति को कम करके नीरसता लाता है। इन परिस्थितियों में शुक्र ग्रह के उपाय मंत्र, दान, व्रत करने से लाभ मिलता है।


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