त्वचा रोग


परिचय :-

त्वचा रोगग्रस्त होने के कारण त्वचा पर अनेक प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते हैं जिन्हें ठीक करने के लिए विभिन्न औषधियों का प्रयोग किया जाता है।

रोग और उसमें प्रयोग होने वाली औषधियां :-

1. इरिसिपिलस रोग वह रोग है जिसमें त्वचा पर गहरे रंग का दाग निकल आता है। इस तरह के त्वचा रोग में ऐकोन, एपिस, आर्स, बेल, यूफार, ग्रैफ, लैके, मर्क तथा रस-टा आदि औषधियों का प्रयोग करने से अधिक लाभ होता है।
  • यदि इरिसिपिलस रोग में उत्पन्न दाग दाईं तरफ से बाईं तरफ की और फैलने लगे तो ऐसे लक्षण में रोगी को एपिस, ग्रैफ तथा लाइको का प्रयोग करें।
  • यदि इरिसिपिलस रोग में दाग बाईं तरफ से दाईं तरफ की ओर फैलने लगे तो ऐसे लक्षण में लैके व रस-टाक्स का प्रयोग करें।
  • यदि दाग के साथ त्वचा पर सूजन भी आ गई हो तो ऐसे में एपिस, बेल, मर्क, रस-टाक्स का प्रयोग करें।

2. किसी कारण से त्वचा को हानि होना या बार-बार एक्स-रे करने से त्वचा की हानि होना आदि कारणों से त्वचा का कैंसर रोग भी हो सकता है। ऐसे में होमियोपैथिक औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
  • कुष्ठ रोग से ग्रस्त रोगी को फैलो-जिगैं, हाइ-एशि, टिना-कार्डि औषधियों का सेवन करना चाहिए।
  • खुजली होने पर विशेष रूप से बुढ़ापे के कारण उत्पन्न खुजली में रोगी को डौली-प्यू का सेवन करना हितकारी होता है।
  • यदि किसी व्यक्ति की त्वचा बुखार के बिना ही गर्म रहती हो तो ऐसे लक्षणों में रोगी को ग्रैफ औषधि का सेवन करना चाहिए।
  • यदि त्वचा पर कठोर गांठें उत्पन्न हो गई हो तो ऐसे लक्षणो से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए विभिन्न औषधियां जैसे- ऐन्टि-क्रू, कैल्के, कोना, लाइको, फास, रस-टा, साइली, सल्फ आदि में से कोई भी प्रयोग कर सकता है।

3. गैंग्रिन रोग में रोगी का मांस सड़ने लगता है। ऐसे रोग से पीड़ित रोगी को आर्से, कास्टि, चायना, प्लम्ब व सिकेल औषधि का सेवन कराना अत्यधिक लाभकारी होता है।

बुढ़ापे के कारण यदि मांस में सड़न आ गई हो तो ऐसे में रोगी को कार्बो-वे या सिकेल औषधि का प्रयोग किया जाता है।

4. त्वचा पर के ऐसे लक्षण जिसमें घाव ठीक होने के बाद फिर से चिटक जाता है। ऐसे त्वचा रोग के लक्षणों में कास्टि, लैके, फास व साइली औषधि का प्रयोग किया जाता है।
  • त्वचा पर गर्मी के कारण उत्पन्न रोग में रोगी को आर्स, आयोड, काली-आ, कर्म, नाइट्र-ऐ, फाइटो या थूजा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • त्वचा से लगातार गाढ़ा बदबूदार स्राव होने पर रोगी को बैल-पेरू औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • घाव का मुंह कील की तरह नुकीले होने पर घाव को ठीक करने के लिए मर्क, फास-ऐ या साइली औषधि का प्रयोग करें।
  • यदि त्वचा पर घाव के कारण टी.बी रोग हो गया हो तो रोगी को आर्स, कास्टि, काली-बाइ, मर्क, रस-टा या साइली औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • घाव का मुंह चपटा होने पर लैके, लाइको, मर्क या नाइट्र-ऐ का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
  • त्वचा में अधिक चर्बी बनने पर चर्बी को कम करने के लिए मर्क औषधि का प्रयोग करना उचित रहता है।
  • त्वचा पर बिना दर्द वाले घाव उत्पन्न होने पर घाव को ठीक करने के लिए लाइको, ओपि या फास-ऐ औषधि का प्रयोग करें।
  • त्वचा पर बनने वाले घाव में तेज दर्द होने पर रोगी को आर्स या बेल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • त्वचा के ऐसे लक्षण जिसमें हल्की सी चोट लग जाने के कारण ही त्वचा पर घाव बन जाते है। ऐसे लक्षणों में बुफो-राना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

5. शरीर में पारे (मर्करी) की मात्रा अधिक होने पर उत्पन्न लक्षणों को दूर करने के लिए ऐसाफ, आरम, हिप, काली-बाइ, लैके, लाइको, नाइट्र-ऐ, फास-ऐ, फाइटो, सार्सा, साइली या सल्फ औषधि का प्रयोग किया जाता है।
  • पारे के कारण शरीर में जलन होने पर रोगी को ऐन्थ्रा, आर्स, कार्बो-स या कार्बो-वेज औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • पारा खा लेने के बाद नासूर (पुराना घाव) बनने पर रोगी को कैल्के, कास्टि, फ्लोर-ऐ, लाइको, फास, पल्स या साइली औषधि का प्रयोग करना हितकारी होता है।
  • पारा खाने के कारण त्वचा का रंग स्याह हो जाने पर आर्स, कार्बो-वे, लैके, लाइको, सिके औषधि का प्रयोग करें।

6. त्वचा पर उत्पन्न ऐसे लाल रंग का घाव जो बदल कर तांबे के रंग हो जाता है। इस तरह के लक्षण वाले घाव में कौरे-रूबम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।

त्वचा के घाव का चिटक जाना आदि लक्षण में कैल्के, ग्रैफ, हिप, पेट्रो, सोरि, पल्स, रस-टा, सार्सा, सिपि या सल्फ औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।

7. त्वचा पर उत्पन्न घाव ठीक होने के बाद भी त्वचा पर घाव का निशान रह जाता है। ऐसे में रोगी को लाइको, फास या आगेव-अमेरी का सेवन कराने से दाग मिटता है।

8. परिसर्पीय छाजन होने पर डौली-प्यूरी, आस्टेरियस-रूबेन्स औषधि का प्रयोग किया जाता है।

9. यदि रोग के हथेली या तलवों पर छाले पड़ गए हो तो ऐसे लक्षणों में बुफरे-राना औषधि का प्रयोग करें।

10. त्वचा में जलन होने के बाद घाव बनने पर ऐकोन, एपिस, आर्स, बेल, ब्रायो, लैके, लाइको, फास, रस-टा, साइली, सल्फ औषधि का प्रयोग करना चाहिए।


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