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अंधविश्‍वास के नाम पर महिलाओं को निर्वस्‍त्र घुमाना


अंधविश्‍वास और जादू-टोने की परम्‍परा ने हर काल में समाज को न केवल विद्रूप, दूषित और शर्मसार किया है बल्कि समाज को बड़े पैमाने पर विघटित भी किया है। हालाँकि समय-समय पर चिंतकों और धर्म सुधारकों द्वारा इस दकियानूस परम्‍परा पर प्रहार किया जाता रहा है, लेकिन उसकी जड़ को खोखला नहीं किया जा सका। सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद अभी भी हमारा समाज अंधविश्‍वास और जादू-टोने के दुष्‍प्रभाव से बाहर निकलता नहीं दिख रहा है। इसके शिकार आमतौर पर बच्‍चे और महिलाएँ ही होती हैं। आए दिन बच्‍चे-बच्चियों की बलि चढ़ाने और महिलाओं को डायन करार देकर बेरहमी से उनकी हत्‍या तक कर दी जाती है। स्‍वतंत्रता के बाद ऐसी कुप्रथाओं से निपटने के लिए कड़े कानूनों का सहारा लेने के साथ ही जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं, लेकिन जमीनीतौर पर आज भी अंधविश्‍वासी कुप्रथाओं के बीज यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं।

हाल ही में झारखण्‍ड राज्‍य के गिरिडीज हिले में एक महिला को उसके अपने भतीजों ने ही डायन बताकर मार डाला। पिछले दिनों उत्‍तर प्रदेश राज्‍य के सीतापुर जिले के कुसेपा दहेली गाँव में एक दम्‍पत्ति ने अपनी बच्‍ची की बलि इसलिए दे डाली कि उनकी तमाम समस्‍याएँ एक झटके में समाप्‍त हो जाएँगीं। देश के कोने-कोने से ऐसी हजारों अंधविश्‍वास भरी घटनाएँ दिल को दहलाती रहती हैं। अभी पिछले दिनों ही यूपी केसोनभ्रद जिले में डायन होने के शक में एक महिला की जीभ काट दी गयी।

गौरतलब है कि ये अंधविश्‍वासी घटनाएँ प्राय: उन क्षेत्रों में देखी जाती है, जहाँ विकास की रोशनी अभी पूरी तरह पहुँच नहीं पायी है। जहाँ रहने वाले लोग शैक्षिक रूप से तो पिछड़े हैं ही साथ ही यहाँ स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएँ भी नदारद हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपनी बीमारी और गरीबी तथा ताम समस्‍याओं का मूल कारण भूत-प्रेत और डायनों में ही टटोलते देखे जाते हैं। अक्‍सर वे तांत्रिकों और ओझा-गुनियों के बहकावे में आकर जघन्‍यतम अपराध करने से भी गुरेज नहीं करते हैं। आधुनिकता और टेक्‍नालॉजी सेलैस होने के बावजूद भी हमारा समाज कितना पिछड़ा और अंधविश्‍वास से ग्रसित है, आँकड़ों के आधार पर इसे आसानी से समझा जा सकता है।


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