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अंधविश्वास का मेला


बैतूल जिले के मलाजपुर गांव में हर साल मकर संक्रांति के बाद लगने वाला और 'भूतों का मेला'  के नाम मशहूर यह मेला लगभग महीनेभर चलता है. मान्यता है कि 1770 में गुरु साहब बाबा नाम के एक संत ने यहां जीवित ही समाधि ली थी. गुरु मान्यता है कि वे संत चमत्कारी थे और भूत-प्रेत को वश में कर लेते थे. उनके समाधि लेने के बाद से ही यहां बाबा की याद में मेला लगने लगा.

मेले में आने वाले सामान्य लोग तो मेला परिसर में मौजूद मंदिर की परिक्रमा करते ही हैं. लेकिन कथित तौर पर भूत-प्रेत के साए से प्रभावित लोग इस मंदिर की उलटी परिक्रमा लगाते हैं. अंधविश्वास के मेले के इस आयोजन में प्रशासन का भरपूर सहयोग होता है.

'भूतों का मेला'  के बारे में बैतूल के कलेक्टर आर.पी. मिश्रा कहते हैं, ''इस मेले में शामिल होने के लिए आने वाले लोगों की संख्या काफी अधिक है. जागरूकता लाने के लिए क्या किया जा सकता है, इस बारे में हम विचार करेंगे. '' जाहिर है, प्रशासन का उदासीन रवैया भी अंधविश्वास के कायम रहने की प्रमुख वजह है.

भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट राजेश शर्मा भूत-प्रेत के आस्तित्व को सिरे से खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ''मेले में आने वाले लोग निश्चित ही किसी न किसी समस्या से ग्रस्त हैं. उनकी परेशानी मानसिक भी हो सकती है और शारीरिक भी. मानसिक रोग से ग्रस्त परिजनों को लोग यहां ले आते हैं. दरअसल किसी भी रोग के इलाज में विश्वास महत्वपूर्ण होता है. इलाज पर विश्वास होता है तो फायदा भी जल्दी मिलता है. ''

शर्मा आगे कहते हैं, ''ऐसी अंधविश्वास भरी प्रथाओं को जागरूकता से ही खत्म किया जा सकता है. '' इसके विपरीत पिछले कुछ वर्षों में इस मेले की ख्याति और भी बढ़ी है. पुजारी लालजी यादव का दावा है कि अब तो मेले में विदेशी पर्यटक भी आने लगे हैं. वे कहते हैं, ''यहां आने वाला कोई भी विदेशी मुझ्से मिले बगैर नहीं जाता. '' अब जरूरत है अंधविश्वास के भूत को लोगों के जेहन दूर करने की.


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