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गांवों कस्बों में फिजुल की सवारियां आदि


सवारियां बडी होनी चाहिये व ठाठ बाट से निकलनी चाहिये आदि भी एक तरह का अंधविश्वास ही है ! गांवों कस्बों में अभी भी छोटी मोटी बात पर फिजुल में सवारियां निकालने और भोज आदि का बडा रिवाज रहता हैं इससे भी जानवरों को खासकर की बग्गी में जुते घोडे, उंट, हाथी आदि को बडे ही कष्ट उठाने ही पडते हैं | सिर्फ किसी ग्रुप विशेष की प्रतिष्ठा या दिखावे के कारण ये आयोजनों में जानवरों का ज्यादा इस्तेमाल करना उचित नही | एक एक रुपये को हाथी जैसा बडा जानवर अपनी सू्ंड से ले कर उपर बैठे पेसे के भूखे खलबुद्धि महावत को बारम्बार दे, ये कहां की इंसानियत है |

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