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संन्यास का ढोंग




ऐसे तो संन्यास भौतिक चीजों के प्रति उदासीन है लेकिन पाखंडियों को उस से प्यार है. मनोरंजन व संचार के साधन उन्हें लुभाते हैं. अब तो साधु मोबाइल, रेडियो, टेपरिकौर्डर व अन्य यंत्रों से लैस होते हैं. मौजमस्ती के लिए सिनेमा या बाजार जाने से भी परहेज नहीं करते. इस दौरान साधुओं का लिबास भी बदल जाता है. संन्यास का ढोंग करने वालों को खूब पता होता है कि ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए...’, ‘पलपल न माने टिंगू जिया...’ व ‘माई नेम इज शीला...’ जैसे आइटम गाने कितनी धूम मचा रहे हैं. कान से ईयरफोन लगा कर सुन रहे ऐसे गाने उन के दिमाग में नया संचार करते हैं.

लंबी दाढ़ी व जटा वाले एक साधु के पास जा कर हम ने पूछा कि बाबा, ‘माई नेम इज शीला...’ गाना सुना है? जवाब में वे ऐसे मुसकराए जैसे दिल के तार को झंकृत कर दिया हो. धर्मनगरी में टहलते हुए हम पेड़ के नीचे आराम फरमा रहे मोटी तोंद वाले एक गेरुए वस्त्रधारी के पास पहुंच गए.

औपचारिक बातचीत के बाद हम ने बातोंबातों में पूछ ही लिया कि बाबा, संन्यास क्या है? उन की भावभंगिमा कुछ ऐसी बदली कि जैसे उन से कुछ अटपटा पूछ लिया हो. मुसकरा कर बोले, ‘घरबार छोड़ दिया, बाबू. मांग कर खा रहे हैं, यही संन्यास है.’ आत्मसंतुष्टि व खामियों को छिपाने वाला यह जवाब उन के लिए काफी था.

तपोवन व अन्य स्थानों पर दोपहर में कई कलियुगी साधु नींद व बीड़ी, सुल्फा सेवन में लीन मिले. कैमरा देख कर वे असहज भी हुए. 70 वर्षीय एक साधु से हम ने पूछा कि यहां आ कर बाबा कैसे बन गए? उस ने अपना नाम गणेशदास उर्फ प्रभुदास बताया और कहा कि जवानी के दिनों में घर में पिता की पिटाई के बाद घर छोड़ दिया और साधु बन गए.

मूलत: रतनागिरी के रहने वाले इस कथित साधु का नाम गणेश था. गेरुआ पहनते ही वह गणेशदास हो गया. वैसे ऐसे लोगों को नहीं पता होता कि जिम्मेदारियों या पुलिस से बच कर भाग जाना संन्यास नहीं होता. ऐसे अनेक निठल्ले चेहरे संन्यासी के लिबास में मिलते हैं.


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