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नशे से गहरी या




यों तो गंगा तट पर किसी भी प्रकार का नशा प्रतिबंधित है लेकिन पीछे का सच चौंकाने वाला है. ‘जाफरान’, ‘करीना’, ‘दिलरुबा’ जैसे देशी ब्रैंड वाली शराब साधुओं की पहली पसंद है. इस के अलावा चरस, भांग, गांजा वाली चिलम सुलगती रहती है.

नशे के बिना उन्हें अपनी दिनचर्या मुश्किल लगती है. सुल्फा को साधु अपनी भाषा में भोले का प्रसाद बताते हैं जैसे भगवान ने उन से मुलाकात कर के कहा हो कि तुम दम लगाओ, मैं तुम्हारा भला कर दूंगा. विदेशी पर्यटकों के साथ नशे की पार्टियां तक की जाती हैं. शुद्ध वातावरण में मादक पदार्थों की गंध आने वालों के नथुनों से टकराती है. कोई पेड़ के नीचे बैठ कर धुएं के छल्ले निकालता है तो कोई तट पर बैठ कर.

परमार्थ निकेतन मार्ग पर चायपान की दुकान चलाने वाली महिला कमला कहती है कि साधु अलगअलग ब्रैंड के गुटके व बीड़ी पसंद करते हैं. उन के कारण ही उस की बिक्री अच्छी होती है. नशे की खुमारी साधुओं के चेहरे पर नृत्य करती दिखती है. नशा क्यों करते हो? इस सवाल का जवाब एक साधु पुराणदास ने यह कहते हुए दिया कि नशा तो हर चीज में होता है बाबू. फिर हम तो भोले बाबा की बूटी, उन की खुशी के लिए पीते हैं. जवाब भले ही हास्यास्पद था लेकिन अधिकांश का तर्क कुछ ऐसा ही होता है. धर्मनगरी में नशे के बड़े कारोबार को दबी जबान से पुलिस भी स्वीकार करती है.


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