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कई मुल्कों में है परंपरा


आज भी दुनिया के कई मुल्क ऐसे हैं जहां खतने की परंपरा आम है. 3 लाख से ज्यादा लड़कियां हर साल खतने का शिकार हो जाती हैं. खासकर, अफ्रीका और मिडल ईस्ट के देशों में खतने की परंपरा बिलकुल आम है.

एक सर्वे के मुताबिक दक्षिण अफ्रीकी देश गुआना में 98.6 फीसदी महिलाएं इस प्रकिया से गुजरती हैं. वहीं मिस्र में यह परंपरा शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में ज्यादा प्रचलन में है. मुसलिमों और ईसाइयों, दोनों में इस का प्रचलन है. दक्षिण अफ्रीका के देश माली में तो महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा इस परंपरा को जारी रखने का समर्थन करता है. समर्थन करने वालों में 15 से 49 वर्ष की उम्र तक की तीनचौथाई महिलाएं हैं. एरिट्रिया में भी ज्यादातर लोगों का मानना है कि यह उन के धर्म की मांग है.

जिबूती में इस के चलते मातृ मृत्युदर और शिशु मृत्युदर बहुत ज्यादा है. आंकड़े बताते हैं कि 14 से 45 वर्ष की उम्र की 93 फीसदी महिलाएं इस प्रक्रिया से गुजरती हैं. सोमालिया में करीब 80 से 98 फीसदी महिलाएं खतने का सामना करती हैं, वहां ज्यादातर 6 से 8 साल की बच्चियों को इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. सूडान में भी शालीनता, मर्यादा और शादी की धारणाओं को ध्यान में रखते हुए बड़ी संख्या में खतना किया जाता है. अगर बात जाम्बिया की करें तो वहां इस प्रक्रिया से गुजरने वाली महिलाओं का प्रतिशत 60 से 90 तक है. इसी तरह बुर्किना में इसे कानूनी तौर पर मान्यता मिली हुई है. वहां महिलाओं को बिना एनस्थीसिया दिए खतने की दर्दनाक प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है. चाड में आंकड़े बताते हैं कि वहां कम से कम 60 फीसदी महिलाएं खतने से गुजरती हैं.

यह कुप्रथा इराकी कुर्दिस्तान में बड़े स्तर पर कायम है. वहां 72 फीसदी बच्चियों का खतना हो जाता है. डब्लूएचओ के 2013 के सर्वे के मुताबिक, खतने के दौरान मौत की आशंका 70 फीसदी बढ़ जाती है. इस के अलावा अफ्रीका में हर साल 5 से 7 हजार बच्चों की प्रसव के दौरान मौत का कारण मां का खतना होता है.


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