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लूट का खेल


पैसा फूंकने की शुरुआत मुहूर्त निकलवाने से होती है. यह काम पंडित ही करता है. शुभ कार्य करने के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं तो पैसे का मुंह नहीं देखते.

बढ़ती महंगाई के चलते मुहूर्त के रेट भी बढ़ गए हैं. आमतौर पर लोग तीर्थयात्रा का मुहूर्त निकलवाने के 101 रुपए देते हैं. पर हकीकत में यह राशि 1 हजार रुपए से ज्यादा होती है. मुहूर्त के साथ पंडित रास्ते की जानकारी, ठहरने के स्थान और तीर्थस्थल के नामी पंडित का भी पता बता देता है और यह भी कह देता है कि उन्हें बता देना कि आप मेरे यजमान हो. 2 से 5 साल में स्थानीय पंडित तीर्थ नहीं ‘अर्थयात्रा’ के मकसद से तीर्थस्थल जाता है और प्रति तीर्थयात्री अपना कमीशन वसूलने के साथसाथ धंधे के नए गुर सीख कर वापस आता है.

हैरत वाली बात यह है कि गया, इलाहाबाद और बनारस के पंडे उधारी में भी तीर्थयात्रियों के धार्मिक कृत्य करवाते हैं और बाद में ब्याज सहित वसूलते हैं. एक जिले में एक प्रमुख पंडित होता है जिस के पास सभी घरों की 7 पीढि़यों का लेखाजोखा होता है. इलाहाबाद में जो विदिशा जिले का पंडित है उसे विदिशा वासियों से 4 करोड़ की उधारी वसूलनी है.

अब यह काम मोबाइल फोन पर होने लगा है. तीर्थस्थल के पंडित को जादू के जोर से मालूम हो जाता है कि मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के गंगरवाड़े गांव से क्षत्रिय जाति के कमर सिंह आ रहे हैं जिन की गांठ में कम से कम 25 हजार रुपए हैं. तीर्थयात्रा पर जाने के पहले या आने के बाद ग्रामभोज या शहरों में परिचितों को बुला कर खाना खिलाने का रिवाज भी चलन में है. इस पर लोग हैसियत के मुताबिक 10 से ले कर 25 हजार रुपए तक खर्च कर देते हैं. तीर्थयात्रा की तरह ही इस रिवाज का कोई औचित्य नहीं है पर चूंकि बापदादों के जमाने से होता आ रहा है इसलिए लोग ऐसा करते हैं यानी खासी फुजूलखर्ची तीर्थयात्रा शुरूहोने से पहले शुरू हो चुकी होती है.

तथाकथित पुण्य के इस कार्य में आनेजाने और ठहरने पर लगभग 10 हजार रुपए औसतन खर्च होते हैं. पैसे वाले लोग तो लाखों रुपए फूंक देते हैं. आज हर तीर्थस्थल पर भव्य होटल हैं जिन में तमाम आधुनिक सुखसुविधाएं उपलब्ध हैं.

असल खर्च तब शरू होता है जब तीर्थयात्री नदी किनारे बैठे पंडों की गिरफ्त में आता है, जो दरअसल गाइड का भी काम करते हैं. हर एक पूजा का रेट तय होता है. अब मोलभाव भी होने लगा है जो यह बताता है कि धर्म से बड़ा धंधा कोई नहीं.

तीर्थस्थल पर दर्जनों मंदिर होते हैं जिन में चढ़ावा चढ़ा कर लोग अपना पैसा बरबाद ही करते हैं. भिखारियों और साधुसंतों को भी तबीयत से दान देते हैं क्योंकि कहा यह भी जाता है कि तीर्थस्थल पर दान करने से मोक्ष मिलता है, वहां नर के रूप में साक्षात नारायण रहते हैं. दरअसल, ये साधु और भिखारी तीर्थस्थलों के चलतेफिरते होर्डिंग्स होते हैं जिन की रोजाना की औसत कमाई हजार रुपए होती है. 2-3 दिन में तीर्थयात्री की जेब खाली हो जाती है.



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