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धर्म की दुकान


प्रचार किया जाता है कि अमरनाथ यात्रा में खानेपीने में पैसा खर्च नहीं होता, जगहजगह पर लंगर चलता रहता है. हकीकत यह है कि खाना तो कहींकहीं मिल जाता है पर पानी की बोतल 100 रुपए में खुलेआम बिकती है. यही हाल तिरुपति और शिरडी जैसे तीर्थस्थलों का भी है. ठहरने के होटलों में कमरों के दाम तो सीजन में आसमान छूने लगते हैं. चारोंधाम जाएं, वैष्णो देवी या धार्मिक शहरों में तीर्थयात्रा पर जाएं, सब फुजूलखर्ची ही है, तीर्थयात्री को हासिल कुछ नहीं होता.

तीर्थयात्रा करने का एक बड़ा लालच यह प्रचार भी है कि यहां हजारों साल की उम्र के सिद्ध साधु रहते हैं, दुर्लभ जड़ीबूटियां व ओषधियां मिलती हैं. इस के अलावा तीर्थों के दर्शन लाभ से तमाम दुख दूर हो जाते हैं.

ये सब काल्पनिक चीजें पाने के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है जिसे खर्च के बजाय बरबादी या फुजूलखर्ची ही कहा जाना बेहतर होगा. हैरानी यह है कि यह फुजूलखर्ची और बरबादी मध्य प्रदेश में सरकारी स्तर पर होने लगी है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पूरे धूमधड़ाके से सरकारी पैसे पर प्रदेशवासियों को तीर्थयात्रा करवा रहे हैं. हिंदूवादी संगठन तीर्थयात्रा का जम कर प्रचार करते हैं. पंडों का काम कर रहे ये लोग दरअसल लोगों को कंगाल करने का इंतजाम कर रहे हैं. क्योंकि तीर्थयात्रा से लौटे लोग अब जगहजगह गंगाजली खोलेंगे, सामूहिक भोज देंगे और इस के पहले तीर्थस्थलों के पंडों को तो काफी दक्षिणा चढ़ा ही चुके होंगे.

मध्य प्रदेश में अब बड़े पैमाने पर हो यह रहा है कि जिन लोगों की सरकारी तीर्थयात्रा में जाने की लौटरी नहीं लगी वे यहांवहां से पैसे जुगाड़ कर खुद ही जाने का इंतजाम कर रहे हैं. जाहिर है ये लोग अपने जरूरी खर्चों में भी कटौती कर रहे हैं पर इस बाबत शिवराज सिंह को दोषी करार नहीं दिया जा सकता क्योंकि वे तो अपने हिंदुत्व के एजेंडे का प्रचारप्रसार कर रहे हैं जिस में उन की जेब से फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं होनी.


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