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धर्मगुरुओं की हवसपूर्ति


जिन मंदिरों में ये देवदासियां रहती हैं, वहां खूब भीड़ होती है. मंदिर के पुजारी की आज्ञा के बगैर इन देवदासियों को किसी से बात करने की मनाही होती है.

देवदासी प्रथा का प्रचलन सनातन धर्म में शताब्दियों से है. दक्षिण भारत के कई राज्यों में हजारों की तादाद में सनातन हिंदू धर्म के मंदिरों में देवदासी धर्मगुरुओं, पुरोहितों, ब्राह्मणों, स्वामियों और धर्माधिकारियों की सेवा करती थीं. वैसे तो यह कहा जाता था कि ये मंदिर और देवमूर्तियों की सेवा (सफाई और साजसज्जा) करती हैं लेकिन परदे की आड़ में ये मंदिर के पुजारी की ‘रखैल’ के रूप में रहती थीं. देवदासियां जाति के मुताबिक ‘निम्न’ जाति की ही होती थीं, आज भी दक्षिण में नीची कही जाने वाली जाति की ही देवदासियां मंदिरों में तथाकथित ‘देवसेवा’ में लगी हुई हैं.

इस तरह आज भी आधुनिक समाज में हजारों लड़कियां धर्म के नाम पर देवदासी बनने के लिए मजबूर की जाती हैं. हैरानी की बात यह भी है कि जिन राज्यों में हजारों की तादाद में देवदासियों का खुल्लमखुल्ला शोषण होने की बात कही जा रही है उन राज्यों में देवदासी प्रथा के खिलाफ अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.

जिन देवदासियों का मानसिक व यौन शोषण होता है वे उस परिवार से संबंध रखती हैं जो अमूमन निर्धन तो होता ही है, अशिक्षित और अंधविश्वासी भी होता है. पहले ऐसे परिवार की खोज मंदिर के पुजारी के जरिए करवाई जाती है. और ऐसे परिवारों को वरीयता दी जाती है जहां लड़कियां सुंदर और मांसल हों. फिर मंदिर के पुजारी का आमंत्रण ‘देवपूजा’ के नाम पर उस परिवार को दिया जाता है और यह भी बताया जाता है कि तुम्हारे भाग्य चमके हैं, अब तुम्हारी खराब आर्थिक स्थिति का अंत होने वाला है. तुम परिवार के साथ ‘देवता की सेवा में’ फलां तारीख को आ जाना.

आमंत्रण पा कर वह मजबूर और धर्मभीरु परिवार निर्धारित तारीख को परिवार के साथ पहुंच जाता है. पहुंचते ही उस के परिवार की शानदार आवभगत की जाती है. इतनी इज्जत पा कर वह सबकुछ मानने को तैयार हो जाता है, जो पुजारी कहता है. धर्म की दुहाई, आर्थिक मदद और स्वर्ग दिलाने की ठेकेदारी पुजारी की तरफ से दी जाती है. परिवार पुजारी को लड़कियां सौंप कर चला जाता है. पुजारी लड़कियों को यह समझाने में कामयाब हो जाता है कि उन की शादी मंदिर की मूर्ति से कर दी जाएगी. इस से देवता प्रसन्न होंगे और उन की सारी (हर तरह की) परेशानियां दूर हो जाएंगी. नाम तो होता है पत्थर के देवता के साथ शादी होने का लेकिन हनीमून उन के संग मंदिर का पुजारी ही मनाता है.


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